आरसीएम का कोई भी हितैसी जब आरसीएम के सम्बन्ध मे चर्चा करता है तो वह डायरेक्ट सेलिंग के उस भारतीय वर्जन की बात करता है जिसको आरसीएम के नाम से फैसन सूटींग पिछले 11 वर्षो से सफलता पूर्वक न केवल चला रहा है बल्कि पूरे देस के लगभग1.5 करोड लोगो को वह उसमे भागीदार भी बना चुका है । इसकी इस सफलता का एकमात्र कारण इस कनस्पट के भारतीय आर्थिक और सामाजिक परिवेश के हिसाब से एक दम सटीक वैठना है जिसके प्रोडक्टो के उपभोग से लेकर आमदानी मे न केवल ग्राहक की भागीदारी है अपितु उसमे समाज मे फैले हुये बहुत सी दूसरी बुराइयो को बिना किसी शोर शराबे के दूर करने की क्षमता भी है । इन सबके बाबजूद यह नही कहा जा सकता है इसमे कमिया नही हो सकती है जरूर हो सकती है । जब देश के बुद्धिजिवियो द्वारा बनाये गये संविधान मे 100 से अधिक संशोधन हो सकते है तो इसमे क्यो नही ?
आरसीएम परिवार के जो भी करोडो लोग आज इस कनसपट के सपोर्ट मे संधर्ष कर रहे है वह भी यह मानते है कि यदि इस कनसपट को चलाने के दौरन इसको चलाने वालो से जाने अनजाने कोई गलती हुई भी हो तो उसकी ठीक तरीके के जाँच हो इसके लिये किसी का कोई विरोध नही है यदि इस जाँच के दौरान इसमे कोई कमी नजर आती है तो निश्चित रूप से उस कमी को दूर किया जाना चाहिये जिससे कि यह कनसपट इस देश के लिये वरदान सावित हो सके । लेकिन यह जाँच इस कन्सपट के साथ जुडे उपभोक्ताओ के हितो को ताक पर रखकर नही की जानी चाहिये । लाखो लोग जिनकी रोजी रोटी का सहारा आज आरसीएम ही है उनके घर मे इस महीने अभी तक कोई पैसा नही पहुचा है कब तक पहुचेगा यह भी पता नही और जो लोग केवल आरसीएम के ही प्रोडक्ट लेते है उनको स्टोरो पर सामान भी न मिले और सामान लेने वालो को बिना कोई अपराध किये अपराधियो जैसा व्यवहार झेलना पडे और अपने घरो से छुपने को मजबूर होना पडे , पिछले 11 वर्षो से सुचारू रूप से चल रहे इस कन्सपट को चला रही कम्पनी और इसके उपभोगताओ के साथ चल रहे इस खेल को क्या जाँच कहा जा सकता है ? यह जाँच नही यह तो आम आदमी के मुह से निवाला छिनना है । जाँच का मतलब निवाला देना होना चाहिये न कि छिनना ।



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