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कौन करे सुनवाई ?
आत्महत्या करने लगे हैं आरसीएम के लोग!
खबरकोश ब्यूरो। उन्होंने अब तक 250 जिला कलक्टरों, तीन दर्जन सांसदों तथा मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक न्याय की गुहार लगा ली है, मगर कहीं कोई सुनवाई नहीं है। जंतर-मंतर पर सैकड़ों लोगों ने आमरण अनशन किया है, भीलवाड़ा में प्रदर्शन किया है तथा आजकल वे राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित उद्योग मैदान में खुले आसमान तले चीख-चीख कर नारे लगा रहे है, हमें न्याय दो, एक कानून दो, हमारे लिए गाइड लाइन बनाओ और अगर हम गलत है तो हमें सजा दो…. मगर भूखे मरने के लिए मत छोड़ो।
सरकार की चमड़ी बहुत मोटी होती है, उस पर असर धीरे-धीरे होता है, कई बार तो होता ही नहीं है, वह किसी की सुनती है किसी की नहीं सुनती है, किसी किसी की सुनना नहीं चाहती है। यही राजस्थान की स्वदेशी रिटेल कंपनी आरसीएम के साथ हो रहा है, माना जा रहा है कि एक बेहद उच्च स्तरीय षडयंत्र के तहत किराणे में एफडीआई को देश में लाने के लिए इस महत्वपूर्ण भारतीय कंपनी को सुनियोजित तरीके से तहस-नहस किया जा रहा है। इस कंपनी के देशभर में एक करोड़ 33 लाख वितरक है तथा तकरीबन 5 हजार रिटेल शॅाप व बाजार है जिनमें हजारों कर्मचारी कार्यरत है। इसके 700 उत्पाद है जो विभिन्न राज्यों में स्थित औद्योगिक उत्पादन इकाईयों में बनते है, इनमें भी हजारों लोग रोजगार प्राप्त करते थे, अब चूंकि 9 दिसंबर 2011 से आरसीएम को पुलिस ने बंद करवा दिया है तो उससे जुड़े लोग बेरोजगारी की ओर चल पड़े है तथा कई लोगों के तो भूखों मरने की नौबत आ गई है।
आरसीएम के कई लोग इस बेवजह सरकारी दखल और न्याय मिलने में हो रही देरी के कारण आत्महत्या के कगार पर पहुंच चुके है, ऐसे ही एक वितरक मध्यप्रदेश के निवासी नवीन साहू ने कंपनी बंद होने के बाद तंगहाली और बेरोजगारी के चलते आत्महत्या कर ली है, यह बेहद भयानक स्थिति है, आरसीएम के संघर्षरत लोगों का कहना है कि- राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार नवीन साहू की मौत के बोझ तले दबी हुई है, उनका मानना है कि अगर जल्दी ही न्याय नहीं मिला तो हमें डर है कि फिर कहीं ऐसा नहीं हो जाए कि कोई और भी नवीन साहू की राह पर चल निकले।
सरकार की चमड़ी बहुत मोटी होती है, उस पर असर धीरे-धीरे होता है, कई बार तो होता ही नहीं है, वह किसी की सुनती है किसी की नहीं सुनती है, किसी किसी की सुनना नहीं चाहती है। यही राजस्थान की स्वदेशी रिटेल कंपनी आरसीएम के साथ हो रहा है, माना जा रहा है कि एक बेहद उच्च स्तरीय षडयंत्र के तहत किराणे में एफडीआई को देश में लाने के लिए इस महत्वपूर्ण भारतीय कंपनी को सुनियोजित तरीके से तहस-नहस किया जा रहा है। इस कंपनी के देशभर में एक करोड़ 33 लाख वितरक है तथा तकरीबन 5 हजार रिटेल शॅाप व बाजार है जिनमें हजारों कर्मचारी कार्यरत है। इसके 700 उत्पाद है जो विभिन्न राज्यों में स्थित औद्योगिक उत्पादन इकाईयों में बनते है, इनमें भी हजारों लोग रोजगार प्राप्त करते थे, अब चूंकि 9 दिसंबर 2011 से आरसीएम को पुलिस ने बंद करवा दिया है तो उससे जुड़े लोग बेरोजगारी की ओर चल पड़े है तथा कई लोगों के तो भूखों मरने की नौबत आ गई है।आरसीएम के कई लोग इस बेवजह सरकारी दखल और न्याय मिलने में हो रही देरी के कारण आत्महत्या के कगार पर पहुंच चुके है, ऐसे ही एक वितरक मध्यप्रदेश के निवासी नवीन साहू ने कंपनी बंद होने के बाद तंगहाली और बेरोजगारी के चलते आत्महत्या कर ली है, यह बेहद भयानक स्थिति है, आरसीएम के संघर्षरत लोगों का कहना है कि- राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार नवीन साहू की मौत के बोझ तले दबी हुई है, उनका मानना है कि अगर जल्दी ही न्याय नहीं मिला तो हमें डर है कि फिर कहीं ऐसा नहीं हो जाए कि कोई और भी नवीन साहू की राह पर चल निकले।
गौरतलब है कि देश की सबसे बड़ी मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनियों में से एक भीलवाड़ा की आरसीएम कंपनी पर राज्य सरकार के बेजा शिकंजे के चलते उससे सक्रिय रूप से जुड़े लाखों लोग पिछले 5 महीनों से बेरोजगार हो गए है। कंपनी के वितरकों की संस्था RCMDWA का दावा है कि आरसीएम चिटफंड कंपनी नहीं है, वह मनी सर्कुलेशन के कारोबार में नहीं है, वह उत्पाद आधारित प्रत्यक्ष वितरण प्रणाली की पद्धति से व्यवसाय करती है तथा अपने वितरकों व उपभोक्ताओं को प्रोत्साहन राशि का भुगतान करती है, आरसीएम के प्रवक्ताओं के मुताबिक प्रतिवर्ष कंपनी 125 करोड़ रुपए आयकर, बिक्री कर तथा उत्पाद शुल्क के रूप में चुकाती रही है तथा हर उत्पाद पक्के बिल पर ही बेचा जाता है, जिसका बाकायदा टैक्स काटा जाता तथा सारा भुगतान बैंकों के जरिए होता था, ऐसे में सरकार को यह समझना चाहिए कि रियल एमएलएम और फर्जी चिटफंड कंपनियां अलग-अलग है, उन्हें एक ही कानून से नहीं नियंत्रित किया जाना चाहिए।
जयपुर में बार-बार यह कहा जा रहा है कि राजस्थान पुलिस के कई अधिकारी कर्मचारी गोल्डसुख नामक सोना बुकिंग करने के नाम पर गोरखधंधा करने वाली कंपनी के साथ जुड़कर आम लोगों के साथ भारी धोखाधड़ी कर चुके है, अब स्वयं की खाल बचाने के लिए और लोगों का ध्यान अपनी ओर से हटाने के लिए सुव्यवस्थित रूप से काम कर रही संपूर्ण स्वदेशी कंपनी आरसीएम को तहस-नहस किया जा रहा है। आरसीएम से जुड़े लोग पूछ रहे है कि इस देश में न्याय कहां है? भ्रष्ट लोगों की तो बेल (जमानत) हो रही है और टीसी छाबड़ा को जेल हो रही है।
जयपुर में बार-बार यह कहा जा रहा है कि राजस्थान पुलिस के कई अधिकारी कर्मचारी गोल्डसुख नामक सोना बुकिंग करने के नाम पर गोरखधंधा करने वाली कंपनी के साथ जुड़कर आम लोगों के साथ भारी धोखाधड़ी कर चुके है, अब स्वयं की खाल बचाने के लिए और लोगों का ध्यान अपनी ओर से हटाने के लिए सुव्यवस्थित रूप से काम कर रही संपूर्ण स्वदेशी कंपनी आरसीएम को तहस-नहस किया जा रहा है। आरसीएम से जुड़े लोग पूछ रहे है कि इस देश में न्याय कहां है? भ्रष्ट लोगों की तो बेल (जमानत) हो रही है और टीसी छाबड़ा को जेल हो रही है।
कहां है न्याय?
भ्रष्टों को बेल, टी.सी. को जेल!
आरसीएम के प्रमुख त्रिलोक चंद छाबड़ा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के निवासी है तथा वे देश के जाने माने उद्योगपति, लेखक, कवि एवं चिन्तक है। टी.सी. छाबड़ा अपने व्यवसाय के जरिये आयकर, बिक्रीकर तथा उत्पाद शुल्क सहित अन्य करों के रूप में प्रतिमाह करोड़ो रुपये सरकार के विभिन्न विभागों में जमा करवाते रहे है तथा उनकी सराहनीय सेवाओं के लिये इन्कम, सेल्स टैक्स आदि विभागों से पुरस्कृत व प्रशंसित भी होते रहे है।
छाबड़ा ने देश में हरित क्रांति के लिये हरित संजीवनी तथा देशवासियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिये ‘‘हेल्थ गॅार्ड आयल’’ जैसे गुणवत्तापूर्ण उत्पादों का नवाचार किया, जिसमें उन्हें आश्चर्यजनक सफलता मिली। उन्होंने तकरीबन 800 उत्पादों के जरिये एक बेमिसाल सम्पूर्ण स्वदेशी रिटेल श्रृंखला स्थापित करके यह साबित कर दिया कि हम भारतीय किसी से कम नहीं है और भारत को आर्थिक जगत की महानतम शक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता है। छाबड़ा ने अपने व्यवसाय को ‘‘आर्थिक आजादी का अभियान’’ कह कर पुकारा और संवर्धित किया। उन्हें देशवासियों का जबरदस्त जनसमर्थन हासिल हुआ।
टी.सी. छाबड़ा केवल पैसा कमाना ही नहीं सिखा रहे थे बल्कि जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना और साधन व साध्य की शुचिता के महात्मा गांधी के सिद्धान्त पर भी अमल कर रहे थे, उनसे जुड़कर हजारों लोग अपराध के रास्तों से वापस लौट आये थे तथा खूंखार नक्सली भी आम इंसान के रूप में काम करने लगे है। उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘जीवन एक खोज’ की 8 लाख से ज्यादा प्रतियां बिकी, इसी प्रकार की कई अन्य प्रेरणास्पद पुस्तकों की उन्होंने रचनाएं की, गीत लिखे, उन्हें संगीत दिया तथा स्वयं गाया भी, कहने का आशय सिर्फ इतना सा है कि उद्योगपति छाबड़ा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न विरल इंसान है जिन पर लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा समान रूप से रही है।
टी.सी. छाबड़ा में सिर्फ एक ही कमी थी (अगर इसे कमी माना जाए तो. . . ) कि वे कभी भी भ्रष्ट नेताओं, निरंकुश पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों तथा दम्भी जनप्रतिनिधियों, फर्जी समाज सेवकों तथा ठग व धर्मान्ध बाबाओं के चरणों में नतमस्तक नहीं हुये, उनका विश्वास कर्मयोग पर रहा तथा एक सच्चे कर्मयोगी के रूप में उन्होंने भारत को आर्थिक जगत की महाशक्ति बनाने की दिशा में पूरे मनोयोग से काम किया।
छाबड़ा के व्यापार में किये गये नवाचार को सर्वत्र सराहना मिली, उन पर प्रबंधन संस्थानों पर शोध प्रारम्भ हुये तथा राजस्थान शिक्षा बोर्ड ने तो बकायदा उनके व्यापारिक तौर तरीकों को अनूठा मानते हुये अर्थशास्त्र की पुस्तक के पाठ्यक्रम में उन्हें शामिल कर लिया। छाबड़ा द्वारा स्थापित आरसीएम बिजनेस ने व्यवसायिक सफलता के प्रतिमान छुये और देश का भरोसा जीतने में कामयाबी हासिल की, उन्होंने साबित कर दिया कि भारतीय किराणा व्यवसाय में स्वयं में इतनी ताकत है कि उसके सामने विदेशी पूंजी से रिटेल की कोई जरूरत ही नहीं है। ऐसे विरल इंसान, दुलर्भ व्यक्तित्व और इस सदी के महान चिन्तक को राजनीतिक द्वेषता, प्रशासनिक हठधर्मिता और पुलिसिया निरंकुशता व निर्ममता के चलते राजस्थान की सरकार तबाह करने पर तुली हुई है।
जो बिजनेस 11 वर्षों तक इसी राज्य शासन की नाक तले आराम से संचालित किया जाता रहा है, उस पर बिना किसी शिकायत के, 9 दिसम्बर को चढ़ाई की गई, आरसीएम वल्र्ड, जो कि छाबड़ा की कम्पनी का मुख्यालय है, उसे सीज किया गया तथा सम्पूर्ण वितरण व्यवस्था को ठप्प कर दिया गया, ऐसा आर्थिक अराजकता का माहौल बनाया गया कि उसका वर्णन ही संभव नहीं है। राजस्थान पुलिस की बर्बर कार्यवाही के कारण लाखों बेरोजगार हो गये है तथा टी.सी. छाबड़ा जैसे अद्भूत किस्म के उद्योगपति को उनके भाई तथा पुत्र के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है, छाबड़ा पर तकरीबन एक दर्जन मुकदमें राजस्थान के विभिन्न जिलों में कायम किये गये है, जिनमें से एफ.सी.आई. से गरीबों का गेहूं खरीद कर बेचने के गंभीर आरोप वाले प्रकरण को तो निचली अदालत ने ही बोगस मानते हुए उन्हें जमानत दे दी तथा दो अन्य मामलों को भी अदमवकु झूठा मान लिया गया है।
आज उनके द्वारा स्थापित आरसीएम बिजनेस से जुड़े लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है राज्य सरकार इस मामले में कोई भी सुनवाई नहीं करना चाहती है, अदालतें अपनी गति से काम कर रही है इस तरह से एक प्रतिभावान व्यक्ति की प्रतिभा को धीरे-धीरे नष्ट होने के लिये छोड़ दिया गया है जो कि अत्यन्त शर्मनाक बात है।
हम उस देश के नागरिक है जहां पर एक हवाई जहाज के यात्रियों के बदले देश के राष्ट्रीय नेता आंतकियों को खुद कांधार छोड़कर आये और हाल ही में एक कलक्टर की रिहाई के बदले कई नक्सलियों को छोड़ने की शर्त स्वीकार करनी पड़ी है और हम जानते है कि अक्सर ऐसी सौदेबाजी में सरकारें तमाम कायदे कानूनों को ताक में रखकर घातक लोगों को भी रिहा करती आई है और आज भी कर रही है।
हमारे इसी राजस्थान में और भीलवाड़ा शहर में जिन लोगों ने वाकई चिटफण्ड कम्पनियां चलाकर लोगों को ठगा, वे आज भी खुले आम घूम रहे है, पुलिस न तो उन्हें गिरफ्तार कर रही है और न ही उनके कार्यालय सीज किये गये है लेकिन एक उत्पाद आधारित सम्पूर्ण स्वदेशी व्यवसाय को द्वेषतावश एक साजिश के तहत नेस्तनाबूद करने की कोशिश की जा रही है। स्वतंत्र भारत में गरिमापूर्ण तरीके से आजीविका कमाना समस्त नागरिकों का मूलभूत मानवीय अधिकार है, लेकिन अगर उसमें शासन व्यवस्था की आरे से खलल डाला जाये तथा नागरिकों के शांतिपूर्ण व्यवसाय करने को बाधित किया जाये तो इस प्रकार के अन्याय को रोकने के लिये उच्च स्तरीय हस्तक्षेप जरूरी है।
छाबड़ा ने देश में हरित क्रांति के लिये हरित संजीवनी तथा देशवासियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिये ‘‘हेल्थ गॅार्ड आयल’’ जैसे गुणवत्तापूर्ण उत्पादों का नवाचार किया, जिसमें उन्हें आश्चर्यजनक सफलता मिली। उन्होंने तकरीबन 800 उत्पादों के जरिये एक बेमिसाल सम्पूर्ण स्वदेशी रिटेल श्रृंखला स्थापित करके यह साबित कर दिया कि हम भारतीय किसी से कम नहीं है और भारत को आर्थिक जगत की महानतम शक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता है। छाबड़ा ने अपने व्यवसाय को ‘‘आर्थिक आजादी का अभियान’’ कह कर पुकारा और संवर्धित किया। उन्हें देशवासियों का जबरदस्त जनसमर्थन हासिल हुआ।टी.सी. छाबड़ा केवल पैसा कमाना ही नहीं सिखा रहे थे बल्कि जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना और साधन व साध्य की शुचिता के महात्मा गांधी के सिद्धान्त पर भी अमल कर रहे थे, उनसे जुड़कर हजारों लोग अपराध के रास्तों से वापस लौट आये थे तथा खूंखार नक्सली भी आम इंसान के रूप में काम करने लगे है। उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘जीवन एक खोज’ की 8 लाख से ज्यादा प्रतियां बिकी, इसी प्रकार की कई अन्य प्रेरणास्पद पुस्तकों की उन्होंने रचनाएं की, गीत लिखे, उन्हें संगीत दिया तथा स्वयं गाया भी, कहने का आशय सिर्फ इतना सा है कि उद्योगपति छाबड़ा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न विरल इंसान है जिन पर लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा समान रूप से रही है।
टी.सी. छाबड़ा में सिर्फ एक ही कमी थी (अगर इसे कमी माना जाए तो. . . ) कि वे कभी भी भ्रष्ट नेताओं, निरंकुश पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों तथा दम्भी जनप्रतिनिधियों, फर्जी समाज सेवकों तथा ठग व धर्मान्ध बाबाओं के चरणों में नतमस्तक नहीं हुये, उनका विश्वास कर्मयोग पर रहा तथा एक सच्चे कर्मयोगी के रूप में उन्होंने भारत को आर्थिक जगत की महाशक्ति बनाने की दिशा में पूरे मनोयोग से काम किया।छाबड़ा के व्यापार में किये गये नवाचार को सर्वत्र सराहना मिली, उन पर प्रबंधन संस्थानों पर शोध प्रारम्भ हुये तथा राजस्थान शिक्षा बोर्ड ने तो बकायदा उनके व्यापारिक तौर तरीकों को अनूठा मानते हुये अर्थशास्त्र की पुस्तक के पाठ्यक्रम में उन्हें शामिल कर लिया। छाबड़ा द्वारा स्थापित आरसीएम बिजनेस ने व्यवसायिक सफलता के प्रतिमान छुये और देश का भरोसा जीतने में कामयाबी हासिल की, उन्होंने साबित कर दिया कि भारतीय किराणा व्यवसाय में स्वयं में इतनी ताकत है कि उसके सामने विदेशी पूंजी से रिटेल की कोई जरूरत ही नहीं है। ऐसे विरल इंसान, दुलर्भ व्यक्तित्व और इस सदी के महान चिन्तक को राजनीतिक द्वेषता, प्रशासनिक हठधर्मिता और पुलिसिया निरंकुशता व निर्ममता के चलते राजस्थान की सरकार तबाह करने पर तुली हुई है।
जो बिजनेस 11 वर्षों तक इसी राज्य शासन की नाक तले आराम से संचालित किया जाता रहा है, उस पर बिना किसी शिकायत के, 9 दिसम्बर को चढ़ाई की गई, आरसीएम वल्र्ड, जो कि छाबड़ा की कम्पनी का मुख्यालय है, उसे सीज किया गया तथा सम्पूर्ण वितरण व्यवस्था को ठप्प कर दिया गया, ऐसा आर्थिक अराजकता का माहौल बनाया गया कि उसका वर्णन ही संभव नहीं है। राजस्थान पुलिस की बर्बर कार्यवाही के कारण लाखों बेरोजगार हो गये है तथा टी.सी. छाबड़ा जैसे अद्भूत किस्म के उद्योगपति को उनके भाई तथा पुत्र के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है, छाबड़ा पर तकरीबन एक दर्जन मुकदमें राजस्थान के विभिन्न जिलों में कायम किये गये है, जिनमें से एफ.सी.आई. से गरीबों का गेहूं खरीद कर बेचने के गंभीर आरोप वाले प्रकरण को तो निचली अदालत ने ही बोगस मानते हुए उन्हें जमानत दे दी तथा दो अन्य मामलों को भी अदमवकु झूठा मान लिया गया है।
आज उनके द्वारा स्थापित आरसीएम बिजनेस से जुड़े लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है राज्य सरकार इस मामले में कोई भी सुनवाई नहीं करना चाहती है, अदालतें अपनी गति से काम कर रही है इस तरह से एक प्रतिभावान व्यक्ति की प्रतिभा को धीरे-धीरे नष्ट होने के लिये छोड़ दिया गया है जो कि अत्यन्त शर्मनाक बात है।हम उस देश के नागरिक है जहां पर एक हवाई जहाज के यात्रियों के बदले देश के राष्ट्रीय नेता आंतकियों को खुद कांधार छोड़कर आये और हाल ही में एक कलक्टर की रिहाई के बदले कई नक्सलियों को छोड़ने की शर्त स्वीकार करनी पड़ी है और हम जानते है कि अक्सर ऐसी सौदेबाजी में सरकारें तमाम कायदे कानूनों को ताक में रखकर घातक लोगों को भी रिहा करती आई है और आज भी कर रही है।
हमारे इसी राजस्थान में और भीलवाड़ा शहर में जिन लोगों ने वाकई चिटफण्ड कम्पनियां चलाकर लोगों को ठगा, वे आज भी खुले आम घूम रहे है, पुलिस न तो उन्हें गिरफ्तार कर रही है और न ही उनके कार्यालय सीज किये गये है लेकिन एक उत्पाद आधारित सम्पूर्ण स्वदेशी व्यवसाय को द्वेषतावश एक साजिश के तहत नेस्तनाबूद करने की कोशिश की जा रही है। स्वतंत्र भारत में गरिमापूर्ण तरीके से आजीविका कमाना समस्त नागरिकों का मूलभूत मानवीय अधिकार है, लेकिन अगर उसमें शासन व्यवस्था की आरे से खलल डाला जाये तथा नागरिकों के शांतिपूर्ण व्यवसाय करने को बाधित किया जाये तो इस प्रकार के अन्याय को रोकने के लिये उच्च स्तरीय हस्तक्षेप जरूरी है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार आरसीएम बिजनेस के पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच करवाएं ताकि इस व्यवसाय को मिटा देने की साजिश रचने वाले लोगों के चेहरे बेनकाब हो सकते है। इस संबंध में जयपुर में विगत 9 दिनों से संघर्षरत देशभर के हजारों लोगों की मांग है कि-
आरसीएम बिजनेस पर लगे सभी मामलों की एक ही स्थान पर लाकर उच्च स्तरीय जांच करवाकर हकीकत को सामने लाया जाये। आरसीएम बिजनेस की जांच को जारी रखते हुये उसकी वितरण व्यवस्था को तुरन्त चालू किया जाये ताकि लाखों करोड़ों लोगों को रोजी-रोटी ठप्प नहीं हो। प्रत्यक्ष वितरण व्यापार प्रणाली के व्यवसायों पर निगरानी व नियंत्रण के लिये एक ‘नेशनल एमएलएम रेगुलेटरी अथॅारिटी’ कायम की जाये। एमएलएम पर एक राष्ट्रीय कानून बनाया जाये तथा जब तक कानून बनकर लागू नहीं हो तब तक राजस्थान में इस हेतु गाइड़ लाइन बनाई जायें।
आरसीएम ग्राहक एवं वितरक कल्याण समिति के मुकेश कोठारी, कदम सिंह, अवधेश कुमार, विजय विरोधिया, गोपाल कौशिक, असलम खान, रमेश शर्मा, सुरेंद्र वत्स, मनीष जैन, राजाराम सारण, प्रमोद कुमार सिंह, प्रहलाद राय, अजीत पटेल, अवधेश सिंह, सुरेश मंगल आदि के अनुसार राजस्थान सरकार के गृह सचिव अशोक सम्पतराम की देखरेख में एक गाइडलाइन बनाने की दिशा में काम चल रहा है, दूसरी ओर धरना भी बराबर जारी है, स्वीकृति की समय सीमा समाप्त होने के बाद धरने के टेंट भले ही उखाड़ लिए गए हो मगर इस गर्मी में भी आरसीएम के वितरक जयपुर के उद्योग मैदान में रात-दिन डेरा डाले हुए है, उन्हें एक गांधीवादी और संवेदनशील तथा ईमानदार माने जाने वाले मुख्यमंत्री से न्याय की उम्मीद है, उनका मानना है कि कोई और व्यक्ति नवीन साहू की भांति जिंदगी से हार नहीं जाए, यह बात अशोक गहलोत तक पहुंचाकर ही वे दम लेंगे।
आरसीएम बिजनेस पर लगे सभी मामलों की एक ही स्थान पर लाकर उच्च स्तरीय जांच करवाकर हकीकत को सामने लाया जाये। आरसीएम बिजनेस की जांच को जारी रखते हुये उसकी वितरण व्यवस्था को तुरन्त चालू किया जाये ताकि लाखों करोड़ों लोगों को रोजी-रोटी ठप्प नहीं हो। प्रत्यक्ष वितरण व्यापार प्रणाली के व्यवसायों पर निगरानी व नियंत्रण के लिये एक ‘नेशनल एमएलएम रेगुलेटरी अथॅारिटी’ कायम की जाये। एमएलएम पर एक राष्ट्रीय कानून बनाया जाये तथा जब तक कानून बनकर लागू नहीं हो तब तक राजस्थान में इस हेतु गाइड़ लाइन बनाई जायें।आरसीएम ग्राहक एवं वितरक कल्याण समिति के मुकेश कोठारी, कदम सिंह, अवधेश कुमार, विजय विरोधिया, गोपाल कौशिक, असलम खान, रमेश शर्मा, सुरेंद्र वत्स, मनीष जैन, राजाराम सारण, प्रमोद कुमार सिंह, प्रहलाद राय, अजीत पटेल, अवधेश सिंह, सुरेश मंगल आदि के अनुसार राजस्थान सरकार के गृह सचिव अशोक सम्पतराम की देखरेख में एक गाइडलाइन बनाने की दिशा में काम चल रहा है, दूसरी ओर धरना भी बराबर जारी है, स्वीकृति की समय सीमा समाप्त होने के बाद धरने के टेंट भले ही उखाड़ लिए गए हो मगर इस गर्मी में भी आरसीएम के वितरक जयपुर के उद्योग मैदान में रात-दिन डेरा डाले हुए है, उन्हें एक गांधीवादी और संवेदनशील तथा ईमानदार माने जाने वाले मुख्यमंत्री से न्याय की उम्मीद है, उनका मानना है कि कोई और व्यक्ति नवीन साहू की भांति जिंदगी से हार नहीं जाए, यह बात अशोक गहलोत तक पहुंचाकर ही वे दम लेंगे।




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